मंगलवार, 11 अगस्त 2015

General science G K

**आओ जाने मानव शरीर का विज्ञान **
_________________________
1. वस्यक व्यक्तियों में अस्थियों की संख्या : → 206
2. खोपड़ी में अस्थियां : → 28
3. कशेरुकाओ की संख्या : →33
4. पसलियों की संख्या : →24
5. गर्दन में कशेरुकाएं : →7
6. श्वसन गति : →16 बार प्रति मिनिट
7. हृदय गति : →72 बार प्रति मिनिट
8. दंत सूत्र : → 2:1:2:3
9. रक्तदाव : →120/80
10. शरीर का तापमान : → 37 डीग्री 98.4 फ़ारेनहाइट
11. लाल रक्त कणिकाओं की आयु : → 120 दिन
12. श्वेत रक्त कणिकाओ की आयु : →1 से 3 दिन
13. चेहरे की अस्थियां : → 14
14. जत्रुक की संख्या : →2
15. हथेली की अस्थियां : → 14
16 पंजे की अस्थियां : → 5
17. ह्दय की दो धड़कनों के बीच का समय : → 0.8 से.
18. एक श्वास में खीची गई वायु : →500 मि.मी.
19अरब
ुनने की क्षमता : →20 से १२० डेसीबल
20. कुल दांत : →32 ‪#‎जसबीर_ढांडा‬
21. दूध के दांतों की संख्या : → 20
22. अक्ल दाढ निकलने की आयु : → 17 से 25 वर्ष
23. शरीर में अमीनों अम्ल की संख्या : → 22
24. शरीर में तत्वों की संखया : → 24
25. शरीर में रक्त की मात्रा : → 5 से 6 लीटर (शरीर के भार का 7 प्रतिशत)
26. शरीर में पानी की मात्रा : → 70 प्रतिशत
27. रक्त का PH मान : → 7.4
28. ह्दय का भार : → 300 ग्राम
29. महिलाओं के ह्दय का भार → 250 ग्राम
30. रक्त संचारण में लगने वाला समय → 22 से.
31. छोटी आंत की लंबाई → 22 फीट
33. शरीर में पानी की मात्रा → 22 लीटर
34. मष्तिष्क का भार → 1380 ग्राम
35. महिलाओं के मष्तिष्क का भार → 1250 ग्राम
36. गुणसूत्रों की संख्या → 23 जोड़े
37. जीन्स की संख्या →97 अरब

Rajasthan G K

‬* संभाग= 7
* जिला=33
* नगर_निगम=7
* तहसीले=314
* पचायत__समिति=296
* ग्राम__पचायत=9900
* पर्यटन__सर्किट=10
* पर्यटन_संभाग=4
* वन_मण्डल=13
* विश्वविद्यालय=28
* उपखण्ड=289
* उपतहसीले=189
* विधानसभा__सीटे=200
* लोकसभा__सीटे=25
* राज्यसभा__सीटे=10
* राष्ट्रीय__उद्दान=3
* अभयारण्य=26

भारत के प्रमुख व्यक्ति एवं उनके कार्य- 

भारत के प्रमुख व्यक्ति एवं उनके कार्य- 

1.परिवार नियोजन-

एमएस सेंगर

2.वन महोत्सव- 

के.एम. मुंशी

3.सिनेमा- 

दादा साहब फाल्के

4.पंचायती राज-

 बलवन्त राय मेहता 

5.परमाणु कार्यक्रम-

होमी जहांगीर भाभा

6.भारतीय अर्थशास्त्र- 

एम.विश्वेश्वररैया

7.माऊट एवरेस्ट- 

जार्ज एवरेस्ट

8.हरित क्रांति-

एम.एस.स्वामीनाथन

9.श्वेत क्रांति- 

वर्गीस कुरियन

10.नागरिक उड्डयन-

जे.आर.डी.टाटा

11.जयपुर फुट- 

प्रमोद करण सेठी

12.आधुनिक पुलिस एक्ट-

 बर्टल फ्रेरे

13.सिविल सेवा- 

कार्नवालिस

14.भूदान आन्दोलन- 

विनोबा भावे

15.चिपको आन्दोलन-

सुन्दरलाल बहुगुणा- चंडी प्रसाद भट्ट

16.नक्सलवाद-

चारू मजूमदार

17.जनहित याचिका-

पी.एन.भगवती

18.लोक अदालत-

पी.एन.भगवती

19.लाइफ लाईन एक्सप्रेस-

जान विल्शन

20.ब्लेक होल- 

जयंत नार्लीकर

21.मिसाइल कार्यक्रम-

 ए.पी.जे.अब्दुल कलाम

22.नर्मदा बचाओं आन्दोलन-

मेघा पाटकर

23.पौधो में जीवन की खोज-

 जगदीश चन्दु बसु

24.हिन्दू विधि निर्माता-

 मनु

25.आधुनिक तिरंगा- 

पिगली वेंकैया

26.खुले जेल- 

सम्पूर्णानंद 

27.भारत जोडो-

 बाबा आम्टे

28.बंधुआ मजदूर उन्मूलन- 

स्वामी अग्निवेश

29.बालविवाह निषेध-

हरविलास शारदा

30.विधवा पुर्नविवाह आन्दोलन- 

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर

31.जल संरक्षण आन्दोलन-

 राजेन्द्र सिंह

32.प्रोजेक्ट टाईगर-

 कैलाश सांख्ला

33.देशी रियासतों का एकीकरण-

 बल्लभभाई पटेल

34.ह्दय परिवर्तन-

 जयप्रकाश नारायण

35.उर्दू कविता के जनक-

 अमीर खुसरों

36.सितार के जनक-

अमीर खुसरों

37.शून्यवाद- नागार्जुन

38.वेदों का पुरूत्थान-

 दयानंद सरस्वती

39.वर्धा शिक्षा प्रणाली- 

डा. जाकिर हुसैन

40. स्त्री शिक्षा- 

केशव कर्वे

41.गुरूग्रंथ साहिब संकलन- 

गुरू अर्जुन देव

 

42.कांग्रेस समाजवादी दल -जयप्रकाश नारायण

43.निर्गुन ब्रह्म के संस्थापक-

 कबीर

44.रस चिकित्सा-

 नागार्जुन

45.सिख राज्य के संस्थापक-

 रणजीत सिंह

46.कम्प्यूटर क्रांति-

 सैम पित्रोदा

47.सनातन धर्म के संस्थापक- 

शंकराचार्य

48.आधुनिक बंगाल के निर्माता- 

सुरेन्द्र नाथ बनर्जी

49.मालगुजारी व्यवस्था- 

टोडरमल

50.द्विराष्ट्र सिद्धांत-

 सैय्यद अहमद खां

51.खालिस्तान आन्दोलन-

 डा. जगजीत सिंह चैहान

52.भारत छोड़ो- 

गांधी जी

53.अशोक के शिलालेखो को सर्वप्रथम पढ़ने वाला- 

जेम्सप्रिन्सेप 

54.अशोक के शिलालेखों की खोज-

 पान्द्रेटीपेन्टोलर 

55.अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया- 

उपगुप्त

56.गुप्त वंश की स्थापना         श्रीगुप्त

57.एरण की खोज         के.डी. बाजपेई 

58.भीमबैठका की खोजश्रीधर वाकणकर 

59.सांची स्तपों का निर्माण अशोक

60.सांची स्तूपों की खोजजनरल टेलर 

61.खजुराहों मंदिरों का निर्माणनरसिंह वर्मन (चंदेलराजा)

62.खजुराहों मंदिरों की खोजअल्फ्रेड लायल

63.कुषाण वंश का संस्थापककुजुल कदफिस

64.आयुर्वेद के जनक                         धन्वंतरि

65.शल्य चिकित्सा                सुश्रुप्त

66.सूर्य सिद्धांत               आर्यभट्ट

67.राजपूतों की उत्प का अग्निकुंड सिद्धांत         चंदबरदाई

68.सिन्धु सभ्यता की खोजदयाराम साहनी एवं राखलदास बनर्जी

69.पुरातत्व विभाग का संस्थापक                       अलेक्जेन्डर कर्निघम 

70.वेदों का अध्ययन      मैक्समूलर (जर्मनी)

71.पाटलीपुत्र का सस्थापक                    उदयन

72.विक्रम संवत्   राजा विक्रमादित्य 

73.शक संवत्         कनिष्क 

74.मौर्य वंश का संस्थापकचन्द्रगुप्त मौर्य 

75.भक्ति आन्दोलनचैतन्य महाप्रभु

76.हिन्दू धर्म का पुनरूत्थानशंकराचार्य

77.मुगल वंश का संस्थापक             बाबर 

78.ग्रांड ट्रंक रोड का निर्माता     शेरशाह सूरी

79.रूपये का प्रचलन    शेरशाह सूरी

80.कुतुबमीनार का निर्माण                    कुतुबुद्दीन ऐवक एवं इल्तुतमिश

81.बाजार नीति    अलाउद्दीन खिल्जी

82.लौह एवं रक्त नीति सजदा प्रथा,                       एवं नौरोज त्यौहार     बलवन

83.सोमनाथ मंदिर का विघ्वंश                  मोहम्मद गजनवी 

84.सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण                   सरदार पटैल 

85.बाबरी मस्जिद का निर्माणमीरबाकी

86.ताजमहल का वास्तुकार             उस्ताद ईसा

87.दीन-ए-इलाही धर्म, सुलह कुल की नीति,       इबादत खाने की स्थापना, फतेहपुर सीकरी का निर्माण, मजहर की घोषणा-अकबर

88. राजधानी परिवर्तन, सांकेतिक मुद्रा का        प्रचलन -मोहम्मद तुगलक

89.आगरा का संस्थापक सिकन्दर लोदी 

90.जयपुर का संस्थापक                                  सवाई राजा जयसिंह

91.जंतर-मंतर के संस्थापक                   सवाई राजा जयसिंह

92.चारों मठों के संस्थापक        शंकराचार्य

93.माउंट अबू मंदिरों के निर्माता                         विमलशाह

94.दिल्ली के वास्तुकार                          एडविन लुटयंस

95.राष्ट्रपति भवन के वास्तुकार                         एडविन लुटयंस

96.संसद के वास्तुकार                         एडविन लुटयंस एवं हावर्ड वेकर

97.कोलकाता का संस्थापक          जाब चारनाक

98.मुम्बई का संस्थापकआनोल्ड आग्जियर

99.भुवनेश्वर का वास्तुकारकोनिस बर्गर

100 .चंडीगढ का वास्तुकार     ली कार्बुरियर

101.भारत भवन भोपाल का वास्तुकार-           चार्ल्स  कोरिया

102.इंदौर की स्थापनारानी अहिल्या बाई 

103.गुलाब के इत्र का अविष्कारनूरजहा

104.सांख्य दर्शन            कपिल मुनि

105.योग दर्शन                पतंजलि

106.न्याय दर्शन            गौतम

107.मीमांशा दर्शनजैमिनी

108.उत्तर मीमांशा दर्शनबादरायण

109. सुखवाद                         चार्वाक 

110.बौद्ध धर्म           महात्मा बुद्ध

111.जैन धर्म                       महावीर स्वामी

112. सिक्ख धर्म               गुरूनानक 

 113.ब्रह्म समाज          राजाराम मोहन राय

114.आर्य समाज         दयानंद सरस्वती

115.प्रार्थना समाज               आत्माराम पाण्डुरंग

116.वेद समाज          श्रीधर नायडू

117.थियोसोफीकल सोसाइटी                               मेंडम ब्लेवत्सकी एवं हेनरी अल्काट 

118.सत्यशोधक समाज        ज्योतिबा फुले

119.कूका विद्रोह                               रामसिंह

120.अड़यार आश्रम       एनीबीसेंट

121.अरूविले आश्रम        अरविन्द घोष

122.रामकृष्ण मिशन               स्वामी विवेकानंद

123.वेलुर मठ      स्वामी विवेकानंद

124.शिकागों में भाषण            विवेकानंद (1893)

125.न्यूयार्क में वेदांत सोसाइटी       विवेकानंद

126.गणेश एवं शिवाजी उत्सव बाल गंगाधर तिलक

127.एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल-                 विलियम जोन्स

128.साइंटिफिक सोसाइटीअब्दुल लतीक

129.मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कालेज-सर सैय्यद अहमद खांन

130.कांग्रेस की स्थापना      ए0ओ0 ह्यूम

131.इंडियन एसोसिएशन                                       सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

132.तत्व बोधिनी सभा      देवेन्द्र नाथ टैगोर

133.ब्रिटिश सार्वजनिक सभा  दादाभाई नौरोजी

134.रहनुमाई मजदायसान सभा                        दादाभाई नौरोजी

135.संथाल विद्रोह सिद्ध एवं कान्हू

136.मुंडा विद्रोह   बिरसा मुंडा

137.रेल्वे, डाकतार विभाग, पी0डब्ल्यू0डी0 की स्थापना एवं हड़प नीति -  

लार्ड डलहौजी

138.खुला विश्वविद्यालय        लार्ड पैरी

139.महिला चिकित्सालय                        लेडी डफरिन (1885)

140.पुलिस व्यवस्था                           लार्ड कार्नवालिस (1793)

141. स्थायी बंदोबस्त     लार्ड कार्नवालिस 

142. अंग्रेजी शिक्षा      लार्ड मैकाले 

143. सहायक संधि             लार्ड वेलेजली

144. रैय्यतवाडी व्यवस्था    थामस मुनरो

145. सती प्रथा निषेध कानून कन्या वध, नरवलि, पिंडारी ठगों का अंत - 

लार्ड विलियम बैंटिंग

146. दिल्ली दरबार, वर्नाकुलर प्रेस एक्ट,आर्म्स एक्ट, द्वितीय अफगान युद्ध

लार्ड लिटन

147.इल्बर्ट बिल विवाद, लोकतांत्रिक                       विकेन्द्रीयकरण, प्रथम फैक्ट्री कानून, प्रथम नियमित जनगणना, बालश्रम उन्मूलन-लार्ड रिपन

148.अकर्मण्यता की नीति-           जान लारेंस

149.सर्वेन्टस आफ इंडिया सोसाइटी                 गोपालकृष्ण गोखलने

150. मुस्लिम लीग-       सलीमुल्ला एवं आगा खा

151.  बनारस हिन्दू कालेज एनीबीसेंट 

152.बनारास हिन्दू विश्वविद्यालय                           मदनमोहन मालवीय (1916 )

153.साम्प्रदायिक निर्वाचन पद्धति-     मार्ले एवं मिन्टो

154.गदर पार्टी की स्थापनालाला हरदयाल

155.राष्ट्रगीत की रचना- बंकिम चंद्र चटर्जी

156.राष्ट्रगान        रवीन्द्रनाथ टैगोर

157.शान्ति निकेतन       रवीन्द्रनाथ टैगोर

158.हिन्दू महासभा मदनमोहन मालवीय

159.साबरमती आश्रम        गांधी जी

160.होमरूल लीग  -   तिलकजी (अप्रैल 1916)

161.आल इंडिया होमरूल लीग   एनीबीसेंट

162.राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघडा0 हेडगेवार

163.बहिष्कृत हितकारिणी सभाडा0 अम्बेडकर

164.बारदोली सत्याग्रहसरदार पटैल

165.खिलाफत आंदोलन-मुहम्मद एवं शौकत अली

166.स्वराज पार्टी    चितरंजन दास एवं मोतीलाल नेहरू

167.लालकुर्ती दल  खान अब्दुल गफ्फार खान

168.हिन्दुस्तान लीगभगतसिंह

169.हरिजन सेवक संघमहात्मा गांधी

170.फारवर्ड ब्लाकसुभाष चंद्र बोस

171.आजाद हिन्द फौजकैप्टन मोहन सिंह

172.गांधी जी को महात्मा कहा- रविन्द्रनाथ टैगोर

173.गांधी जी को बापू कहां         नेहरू जी

174.गांधी जी को राष्ट्र पितासुभाष चंद्र बोस

175.मैथलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि-महात्मा गांधी

176.जिन्ना को कायदे आजममहात्मा गांधी

177.सुभाष चंद्र बोस को नेताजीहिटलर

178.नेहरू  जी को चाचा        गांधी जी

179.पाकिस्तान नामक शब्द के जनक-रहमत अली चैधरी

180.आल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास एसोसिएशन       डा0 अम्बेडकर

181.साम्प्रदायिक प्रचार     रेमजे मैकडोनाल्ड

182.नेहरू रिपोर्ट        मोतीलाल नेहरू

183.जलियांवाला बाग हत्याकांड-जनरल डायर

184.संविधान सभा का विचार-एम.एन. राय

185. जनसंघ की स्थापनाश्यामाप्रसाद मुखर्जी

186.सर्वोदय योजना   जयप्रकाश नारायण

187. संविधान सभा के वैधानिक सलाहकार         वी.एन.राव

188.नागरिक उड्डयन जे.आर.डी. टाटा

189.जलविद्युत एवं इस्पात उद्योग के जनक           जे.आर.डी. टाटा

 190.भारतीय झंडा मेडम भीकाजी कामा (1907) (स्टटगार्ड जर्मनी)

191.जनजातियों को नेशनल पार्क की अवधारण-बेरियर एल्विन

192.  गुरूमुखी लिपि, लंगर प्रथा       गुरू अंगद

193.गुरू गंथ साहेब का संकलनअर्जुनदेव

194.अमृतसर के संस्थापकगुरू रामदास

195.स्वर्ण मंदिर का निर्माणअर्जुन देव

196.खालसा पंथ                    गुरू गोविन्द सिंह

197.न्याय की जंजीर         जहांगीर

198. परिवार न्यायालयपी.एन.    भगवती

199.भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के संस्थापकलार्ड क्लाइब

200.आदिवासियों के मसीहा       ठक्कर बापा

201.सूचना का अधिकारअरविन्द केजरीवाल

202.एशियाई खेलो के जनक सोधी गुरुदत्त

203.आगरे का लाल किला    अकबर

204.दिल्ली का लाल किलाशाहजहा

205.कांग्रेस का नामकरणदादा भाई नौरोजी

206.अभिनव भारत                     वीर सावरकर

207.भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी    एम.एन. राय

धन्यवाद

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

हिंदू धर्म एक सिंहालोकन

हिंदू धर्म एक सिंहालोकन

भारत का सर्वप्रमुख धर्म हिन्दू धर्म है, जिसे इसकी प्राचीनता एवं विशालता के कारण 'सनातन धर्म' भी कहा जाता है। ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के समान हिन्दू धर्म किसी पैगम्बर या व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित धर्म नहीं है, बल्कि यह प्राचीन काल से चले आ रहे विभिन्न धर्मों, मतमतांतरों, आस्थाओं एवं विश्वासों का समुच्चय है। एक विकासशील धर्म होने के कारण विभिन्न कालों में इसमें नये-नये आयाम जुड़ते गये। वास्तव में हिन्दू धर्म इतने विशाल परिदृश्य वाला धर्म है कि उसमें आदिम ग्राम देवताओं, भूत-पिशाची, स्थानीय देवी-देवताओं, झाड़-फूँक, तंत्र-मत्र से लेकर त्रिदेव एवं अन्य देवताओं तथा निराकार ब्रह्म और अत्यंत गूढ़ दर्शन तक- सभी बिना किसी अन्तर्विरोध के समाहित हैं और स्थान एवं व्यक्ति विशेष के अनुसार सभी की आराधना होती है। वास्तव में हिन्दू धर्म लघु एवं महान परम्पराओं का उत्तम समन्वय दर्शाता है। एक ओर इसमें वैदिक तथा पुराणकालीन देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती है, तो दूसरी ओर कापलिक और अवधूतों द्वारा भी अत्यंत भयावह कर्मकांडीय आराधना की जाती है। एक ओर भक्ति रस से सराबोर भक्त हैं, तो दूसरी ओर अनीश्वर-अनात्मवादी और यहाँ तक कि नास्तिक भी दिखाई पड़ जाते हैं। देखा जाय, तो हिन्दू धर्म सर्वथा विरोधी सिद्धान्तों का भी उत्तम एवं सहज समन्वय है। यह हिन्दू धर्मावलम्बियों की उदारता, सर्वधर्मसमभाव, समन्वयशीलता तथा धार्मिक सहिष्णुता की श्रेष्ठ भावना का ही परिणाम और परिचायक है।
हिन्दू धर्म के स्रोत

हिन्दू धर्म की परम्पराओं का अध्ययन करने हेतु हज़ारों वर्ष पीछे वैदिक काल पर दृष्टिपात करना होगा। हिन्दू धर्म की परम्पराओं का मूल वेद ही हैं। वैदिक धर्म प्रकृति-पूजक, बहुदेववादी तथा अनुष्ठानपरक धर्म था। यद्यपि उस काल में प्रत्येक भौतिक तत्त्व का अपना विशेष अधिष्ठातृ देवता या देवी की मान्यता प्रचलित थी, परन्तु देवताओं में वरुण, पूषा, मित्र, सविता, सूर्य, अश्विन, उषा, इन्द्र, रुद्र, पर्जन्य, अग्नि, वृहस्पति, सोम आदि प्रमुख थे। इन देवताओं की आराधना यज्ञ तथा मंत्रोच्चारण के माध्यम से की जाती थी। मंदिर तथा मूर्ति पूजा का अभाव था। उपनिषद काल में हिन्दू धर्म के दार्शनिक पक्ष का विकास हुआ। साथ ही एकेश्वरवाद की अवधारणा बलवती हुई। ईश्वर को अजर-अमर, अनादि, सर्वत्रव्यापी कहा गया। इसी समय योग, सांख्य, वेदांत आदि षड दर्शनों का विकास हुआ। निर्गुण तथा सगुण की भी अवधारणाएं उत्पन्न हुई। नौंवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य विभिन्न पुराणों की रचना हुई। पुराणों में पाँच विषयों (पंच लक्षण) का वर्णन है-

सर्ग (जगत की सृष्टि),
प्रतिसर्ग (सृष्टि का विस्तार, लोप एवं पुन: सृष्टि),
वंश (राजाओं की वंशावली),
मन्वंतर (भिन्न-भिन्न मनुओं के काल की प्रमुख घटनाएँ) तथा
वंशानुचरित (अन्य गौरवपूर्ण राजवंशों का विस्तृत विवरण)।
इस प्रकार पुराणों में मध्य युगीन धर्म, ज्ञान-विज्ञान तथा इतिहास का वर्णन मिलता है। पुराणों ने ही हिन्दू धर्म में अवतारवाद की अवधारणा का सूत्रपात किया। इसके अलावा मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, व्रत आदि इसी काल के देन हैं। पुराणों के पश्चात् भक्तिकाल का आगमन होता है, जिसमें विभिन्न संतों एवं भक्तों ने साकार ईश्वर की आराधना पर ज़ोर दिया तथा जनसेवा, परोपकार और प्राणी मात्र की समानता एवं सेवा को ईश्वर आराधना का ही रूप बताया। फलस्वरूप प्राचीन दुरूह कर्मकांडों के बंधन कुछ ढीले पड़ गये। दक्षिण भारत के अलवार संतों, गुजरात में नरसी मेहता, महाराष्ट्र में तुकाराम, पश्चिम बंगाल में चैतन्य महाप्रभु, उत्तर भारत में तुलसी,कबीर, सूर और गुरु नानक के भक्ति भाव से ओत-प्रोत भजनों ने जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।
हिन्दू धर्म की अवधारणाएँ एवं परम्पराएँ

हिन्दू धर्म की प्रमुख अवधारणाएं निम्नलिखित हैं-

ब्रह्म- ब्रह्म को सर्वव्यापी, एकमात्र सत्ता, निर्गुण तथा सर्वशक्तिमान माना गया है। वास्तव में यह एकेश्वरवाद के 'एकोऽहं, द्वितीयो नास्ति' (अर्थात् एक ही है, दूसरा कोई नहीं) के 'परब्रह्म' हैं, जो अजर, अमर, अनन्त और इस जगत का जन्मदाता, पालनहारा व कल्याणकर्ता है।
आत्मा- ब्रह्म को सर्वव्यापी माना गया है अत: जीवों में भी उसका अंश विद्यमान है। जीवों में विद्यमान ब्रह्म का यह अशं ही आत्मा कहलाती है, जो जीव की मृत्यु के बावजूद समाप्त नहीं होती और किसी नवीन देह को धारण कर लेती है। अंतत: मोक्ष प्राप्ति के पश्चात् वह ब्रह्म में लीन हो जाती है।
पुनर्जन्म- आत्मा के अमरत्व की अवधारणा से ही पुनर्जन्म की भी अवधारणा पुष्ट होती है। एक जीव की मृत्यु के पश्चात् उसकी आत्मा नयी देह धारण करती है अर्थात् उसका पुनर्जन्म होता है। इस प्रकार देह आत्मा का माध्यम मात्र है।
योनि- आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। ऐसी 84 करोड़ योनियों की कल्पना की गई है, जिसमें कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष और मानव आदि सभी शामिल हैं। योनि को आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में जैव प्रजातियाँ कह सकते हैं।
कर्मफल- प्रत्येक जन्म के दौरान जीवन भर किये गये कृत्यों का फल आत्मा को अगले जन्म में भुगतना पड़ता है। अच्छे कर्मों के फलस्वरूप अच्छी योनि में जन्म होता है। इस दृष्टि से मनुष्य सर्वश्रेष्ठ योनि है। परन्तु कर्मफल का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति अर्थात् आत्मा का ब्रह्मलीन हो जाना ही है।
स्वर्ग-नरक- ये कर्मफल से सम्बंधित दो लोक हैं। स्वर्ग में देवी-देवता अत्यंत ऐशो-आराम की ज़िन्दगी व्यतीत करते हैं, जबकि नरक अत्यंत कष्टदायक, अंधकारमय और निकृष्ट है। अच्छे कर्म करने वाला प्राणी मृत्युपरांत स्वर्ग में और बुरे कर्म करने वाला नरक में स्थान पाता है।
मोक्ष- मोक्ष का तात्पर्य है- आत्मा का जीवन-मरण के दुष्चक्र से मुक्त हो जाना अर्थात् परमब्रह्म में लीन हो जाना। इसके लिए निर्विकार भाव से सत्कर्म करना और ईश्वर की आराधना आवश्यक है।
चार युग- हिन्दू धर्म में काल (समय) को चक्रीय माना गया है। इस प्रकार एक कालचक्र में चार युग-कृत (सत्य), सत त्रेता, द्वापर तथा कलि-माने गये हैं। इन चारों युगों में कृत सर्वश्रेष्ठ और कलि निकृष्टतम माना गया है। इन चारों युगों में मनुष्य की शारीरिक और नैतिक शक्ति क्रमश: क्षीण होती जाती है। चारों युगों को मिलाकर एक महायुग बनता है, जिसकी अवधि 43,20,000 वर्ष होती है, जिसके अंत में पृथ्वी पर महाप्रलय होता है। तत्पश्चात् सृष्टि की नवीन रचना शुरू होती है।
चार वर्ण- हिन्दू समाज चार वर्णों में विभाजित है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। ये चार वर्ण प्रारम्भ में कर्म के आधार पर विभाजित थे। ब्राह्मण का कर्तव्य विद्यार्जन, शिक्षण, पूजन, कर्मकांड सम्पादन आदि है, क्षत्रिय का धर्मानुसार शासन करना तथा देश व धर्म की रक्षा हेतु युद्ध करना, वैश्यों का कृषि एवं व्यापार द्वारा समाज की आर्थिक आवश्यकताएँ पूर्ण करना तथा शूद्रों का अन्य तीन वर्णों की सेवा करना एवं अन्य ज़रूरतें पूरी करना। कालांतर में वर्ण व्यवस्था जटिल होती गई और यह वंशानुगत तथा शोषणपरक हो गई। शूद्रों को अछूत माना जाने लगा। बाद में विभिन्न वर्णों के बीच दैहिक सम्बन्धों से अन्य मध्यवर्ती जातियों का जन्म हुआ। वर्तमान में जाति व्यवस्था अत्यंत विकृत रूप में दृष्टिगोचर होती है।
चार आश्रम- प्राचीन हिन्दू संहिताएँ मानव जीवन को 100 वर्ष की आयु वाला मानते हुए उसे चार चरणों अर्थात् आश्रमों में विभाजित करती हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। प्रत्येक की संभावित अवधि 25 वर्ष मानी गई। ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्ति गुरु आश्रम में जाकर विद्याध्ययन करता है, गृहस्थ आश्रम में विवाह, संतानोत्पत्ति, अर्थोपार्जन, दान तथा अन्य भोग विलास करता है, वानप्रस्थ में व्यक्ति धीरे-धीरे संसारिक उत्तरदायित्व अपने पुत्रों को सौंप कर उनसे विरक्त होता जाता है और अन्तत: संन्यास आश्रम में गृह त्यागकर निर्विकार होकर ईश्वर की उपासना में लीन हो जाता है।
चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- ये चार पुरुषार्थ ही जीवन के वांछित उद्देश्य हैं उपयुक्त आचार-व्यवहार और कर्तव्य परायणता ही धर्म है, अपनी बौद्धिक एवं शरीरिक क्षमतानुसार परिश्रम द्वारा धन कमाना और उनका उचित तरीके से उपभोग करना अर्थ है, शारीरिक आनन्द भोग ही काम है तथा धर्मानुसार आचरण करके जीवन-मरण से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही मोक्ष है। धर्म व्यक्ति का जीवन भर मार्गदर्शक होता है, जबकि अर्थ और काम गृहस्थाश्रम के दो मुख्य कार्य हैं और मोक्ष सम्पूर्ण जीवन का अंति लक्ष्य।
चार योग- ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग तथा राजयोग- ये चार योग हैं, जो आत्मा को ब्रह्म से जोड़ने के मार्ग हैं। जहाँ ज्ञान योग दार्शनिक एवं तार्किक विधि का अनुसरण करता है, वहीं भक्तियोग आत्मसमर्पण और सेवा भाव का, कर्मयोग समाज के दीन दुखियों की सेवा का तथा राजयोग शारीरिक एवं मानसिक साधना का अनुसरण करता है। ये चारों परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि सहायक और पूरक हैं।
चार धाम- उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम- चारों दिशाओं में स्थित चार हिन्दू धाम क्रमश: बद्रीनाथ, रामेश्वरम्, जगन्नाथपुरी और द्वारका हैं, जहाँ की यात्रा प्रत्येक हिन्दू का पुनीत कर्तव्य है।
प्रमुख धर्मग्रन्थ- हिन्दू धर्म के प्रमुख ग्रंथ हैं- चार वेद (ॠग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद) तेरह उपनिषद, अठारह पुराण, रामायण, महाभारत, गीता, रामचरितमानस आदि। इसके अलावा अनेक कथाएँ, अनुष्ठान ग्रंथ आदि भी हैं।
हिन्दू धर्म का इतिहास

हिन्दू धर्म का 1960853110 साल का इतिहास है. भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं. इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं. इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे, और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे. एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत ही था.

आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहते हैं. पहले दृष्टिकोण के अनुसार लगभग 1700 ईसा पूर्व में आर्य अफ़्ग़ानिस्तान, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बस गये. तभी से वो लोग (उनके विद्वान ऋषि) अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिये वैदिक संस्कृत में मन्त्र रचने लगे. पहले चार वेद रचे गये, जिनमें ऋग्वेद प्रथम था. उसके बाद उपनिषद जैसे ग्रन्थ आये. हिन्दू मान्यता के अनुसार वेद, उपनिषद आदि ग्रन्थ अनादि, नित्य हैं, ईश्वर की कृपा से अलग - अलग मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को अलग - अलग ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त हुआ जिन्होंने फिर उन्हें लिपिबद्ध किया. बौद्ध और धर्मों के अलग हो जाने के बाद वैदिक धर्म मे काफ़ी परिवर्तन आया. नये देवता और नये दर्शन उभरे. इस तरह आधुनिक हिन्दू धर्म का जन्म हुआ.

दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार हिन्दू धर्म का मूल कदाचित सिन्धु सरस्वती परम्परा (जिसका स्रोत मेहरगढ़ की 6500 ईपू संस्कृति में मिलता है) से भी पहले की भारतीय परम्परा में है.
निरुक्त

भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने "हिन्दुस्थान" नाम दिया था जिसका अपभ्रंश "हिन्दुस्तान" है। "बृहस्पति आगम" के अनुसार:

हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥

अर्थात, हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।
"हिन्दू" शब्द "सिन्धु" से बना माना जाता है। संस्कृत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं - पहला, सिन्धु नदी जो मानसरोवर के पास से निकल कर लद्दाख़ और पाकिस्तान से बहती हुई समुद्र मे मिलती है, दूसरा - कोई समुद्र या जलराशि। ऋग्वेद की नदीस्तुति के अनुसार वे सात नदियाँ थीं : सिन्धु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), शुतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुषिणी (रावी) और अस्किनी (चेनाब)। एक अन्य विचार के अनुसार हिमालय के प्रथम अक्षर "हि" एवं इन्दु का अन्तिम अक्षर "न्दु", इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना "हिन्दु" और यह भूभाग हिन्दुस्थान कहलाया। हिन्दू शब्द उस समय धर्म की बजाय राष्ट्रीयता के रुप में प्रयुक्त होता था। चूँकि उस समय भारत में केवल वैदिक धर्म को ही मानने वाले लोग थे, बल्कि तब तक अन्य किसी धर्म का उदय नहीं हुआ था इसलिये "हिन्दू" शब्द सभी भारतीयों के लिये प्रयुक्त होता था। भारत में केवल वैदिक धर्मावलम्बियों (हिन्दुओं) के बसने के कारण कालान्तर में विदेशियों ने इस शब्द को धर्म के सन्दर्भ में प्रयोग करना शुरु कर दिया।

आम तौर पर हिन्दू शब्द को अनेक विश्लेषकों द्वारा विदेशियों द्वारा दिया गया शब्द माना जाता है। इस धारणा के अनुसार हिन्दू एक फ़ारसी शब्द है। हिन्दू धर्म को सनातन धर्म या वैदिक धर्म भी कहा जाता है। ऋग्वेद में सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है - वो भूमि जहाँ आर्य सबसे पहले बसे थे। भाषाविदों के अनुसार हिन्द आर्य भाषाओं की "स्" ध्वनि (संस्कृत का व्यंजन "स्") ईरानी भाषाओं की "ह्" ध्वनि में बदल जाती है। इसलिये सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) मे जाकर हफ्त हिन्दु मे परिवर्तित हो गया (अवेस्ता: वेन्दीदाद, फ़र्गर्द 1.18)। इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दु नाम दिया। जब अरब से मुस्लिम हमलावर भारत में आए, तो उन्होने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया।

इन दोनों सिद्धान्तों में से पहले वाले, प्राचीन काल में नामकरण को, इस आधार पर सही माना जा सकता है कि "बृहस्पति आगम" सहित अन्य आगम, ईरानी या अरबी सभ्यताओं से बहुत प्राचीन काल में लिखा जा चुका था। अतः उसमें "हिन्दुस्थान" का उल्लेख होने से स्पष्ट है कि हिन्दू (या हिन्दुस्थान) नाम प्राचीन ऋषियों द्वारा दिया गया था न कि अरबों/ईरानियों द्वारा। यह नाम बाद में अरबों/ईरानियों द्वारा प्रयुक्त होने लगा।
मुख्य सिद्धान्त

हिन्दू धर्म में कोई एक अकेले सिद्धान्तों का समूह नहीं है जिसे सभी हिन्दुओं को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक जीवन का मार्ग है। हिन्दुओं का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है, और न ही कोई "पोप"। इसके अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं, और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं। फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर हिन्दू मानते हैं, इन सब में विश्वास: धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं), और बेशक, ईश्वर। हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है। हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। हिन्दू धर्म में चार मुख्य सम्प्रदाय हैं : वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते हैं), शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते हैं), शाक्त (जो देवी को परमशक्ति मानते हैं) और स्मार्त (जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं)। लेकिन ज्यादातर हिन्दू स्वयं को किसी भी सम्प्रदाय में वर्गीकृत नहीं करते हैं। प्राचीनकाल और मध्यकाल में शैव, शाक्त और वैष्णव आपस में लड़ते रहते थे. जिन्हें मध्यकाल के संतों ने समन्वित करने की सफल कोशिश की और सभी संप्रदायों को परस्पर आश्रित बताया।

संक्षेप में, हिन्‍दुत्‍व के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-हिन्दू-धर्म हिन्दू-कौन?-- गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ़ा मतिः। पुनर्जन्मनि विश्वासः स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात-- गोमाता में जिसकी भक्ति हो, प्रणव जिसका पूज्य मन्त्र हो, पुनर्जन्म में जिसका विश्वास हो--वही हिन्दू है। मेरुतन्त्र ३३ प्रकरण के अनुसार ' हीनं दूषयति स हिन्दु ' अर्थात जो हीन ( हीनता या नीचता ) को दूषित समझता है (उसका त्याग करता है) वह हिन्दु है। लोकमान्य तिलक के अनुसार- असिन्धोः सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात्- सिन्धु नदी के उद्गम-स्थान से लेकर सिन्धु (हिन्द महासागर) तक सम्पूर्ण भारत भूमि जिसकी पितृभू (अथवा मातृ भूमि) तथा पुण्यभू ( पवित्र भूमि) है, ( और उसका धर्म हिन्दुत्व है ) वह हिन्दु कहलाता है। हिन्दु शब्द मूलतः फा़रसी है इसका अर्थ उन भारतीयों से है जो भारतवर्ष के प्राचीन ग्रन्थों, वेदों, पुराणों में वर्णित भारतवर्ष की सीमा के मूल एवं पैदायसी प्राचीन निवासी हैं। कालिका पुराण, मेदनी कोष आदि के आधार पर वर्तमान हिन्दू ला के मूलभूत आधारों के अनुसार वेदप्रतिपादित रीति से वैदिक धर्म में विश्वास रखने वाला हिन्दू है। यद्यपि कुछ लोग कई संस्कृति के मिश्रित रूप को ही भारतीय संस्कृति मानते है, जबकि ऐसा नही है। जिस संस्कृति या धर्म की उत्पत्ती एवं विकास भारत भूमि पर नहीं हुआ है, वह धर्म या संस्कृति भारतीय ( हिन्दू ) कैसे हो सकती है।

1. ईश्वर एक नाम अनेक

2. ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है

3. ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें

4. हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर

5. हिन्दुओं में कोई एक पैगम्बर नहीं है,

6. धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर बार-बार पैदा होते हैं

7. परोपकार पुण्य है दूसरों के कष्ट देना पाप है.

8. जीवमात्र की सेवा ही परमात्मा की सेवा है

9. स्त्री आदरणीय है

10. सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है

11. हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में

12. पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता

13. हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी

14. आत्मा अजर-अमर है

15. सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र

16. हिन्दुओं के पर्व और त्योहार खुशियों से जुड़े हैं

17. हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है

18. हिन्दुत्व एकत्व का दर्शन है